Thursday, 8 November 2012

कुछ  और ज़ुल्म करे ज़माना तो  मुकम्मल  करदू
बस एक  उन्वान  की ज़रूरत  हे मेरे  अफसाने को

जाने  क्यों   कहते हे लोग मुझे  बड़ा  जहा  शनास
रस्म-ऐ-दुनिया का मगर शऊर नहीं मुझ दीवाने को

   ***(( अय्यूब खान "बिस्मिल" ))**
               ***(( ग़ज़ल   ))***
                       मैरी राह

काँटों  भरी  हे  मैरी   राह  सोंच  लेना  चलने से  पहले
करना होगा इनसे ही निबाह सोंच लेना चलने से पहले

तूफ़ान  का अंदेशा हे और  शिकस्ता मेरा सफीना  भी
मिले ना  मिले कोई  पनाह सोंच लेना चलने  से पहले

मंज़िल की जुस्तजू  में तूफानो से भी लड़  जाऊंगा  मै
रखना होगा यक़ीन  बे पनाह सोंच लेना चलने से पहले

दगा , फ़रेब  और बदगुमानियो की   जहाँ-ऐ-खराब में
बड़ी  सख्त हे  सितमगाह  सोंच लेना  चलने  से पहले

दुनिया चाहे  बदल भी  जाये "बिस्मिल" नहीं  बदलेगा
रखना होगा यक़ीन बे पनाह सोंच लेना चलने से पहले

  **(( अय्यूब खान "बिस्मिल" ))**